रविवार, 15 सितंबर 2019

आयुर्वेद के राजदूत भगवान श्रीकृष्ण

श्रीकृष्णजन्माष्टमी पर विशेष
आयुर्वेद के राजदूत : श्रीकृष्ण
श्री कृष्ण और आयुर्वेद के प्रतिपादक श्री धन्वंतरि, दोनों ही भगवान विष्णु के अवतार हैं और आयुर्वेद के साथ प्रत्यक्षतः जुड़े हुए हैं। जो लोग उनके द्वारा बताए गए आदर्श जीवन के प्रतिमानों का अध्ययन करने का प्रयास करते हैं, वे अपने जीवन को स्वस्थ, सम्पन्न और सफल बनाकर सम्पूर्ण शांति का आनंद उठाने का मार्ग प्राप्त कर लेते हैं।
महाभारत का युद्ध आरम्भ होने के पूर्व भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिये गए सम्पूर्ण दिशा निर्देश श्रीमद्भगवद्गीता के 700 श्लोकों में संकलित है। इसमें कहा गया है कि – चेतना या प्राण जीवनीय शक्ति ब्रह्मांड के रूप में प्रकट होती है और पूरे जीवन चक्र में विद्यमान रहती है। जीवन चक्र के समक्ष जो चुनौतियां होती हैं, वे किसी युद्ध की घटनाओं के समान ही होती हैं यह युद्ध केवल श्रीकृष्ण के काल और स्थान तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि सर्वकालिक और सार्वभौमिक होती हैं। यह संदेश सांकेतिक रूप इस ब्रह्मांड के निर्माण में प्रयुक्त पांच तत्वों में संभव जटिलताओं के बारे में हैं लेकिन ये जटिलताएं मानव समाज के भौतिक, सामाजिक, पर्यावरणीय एवं मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी संभव हैं। महान महाभारत महाकाव्य की वास्तविक विषयवस्तु भी यही है।
पांच पांडव ‘पांच तत्वों’ के प्रतीक हैं। ये अपने अंदर निहित गुणों के अनुसार कार्य करते हैं। मन का उत्तरदायित्व ज्ञानेन्द्रियों पर नियंत्रण और उनका उपयुक्त समन्वय करना है। जब मन अपने प्राकृतिक कार्य से विमुख किसी ज्ञानेन्द्रिय के अधिकार में होता है तो मन में अहम(Ego) का उदय होता है जो चेतना से अलगाव उत्पन्न कर विभाजन का कारण बनता है। वास्तव में, ज्ञानेन्द्रियों एवं मन को धर्म या प्राकृतिक नियमों के अनुसार करना होता है। चूंकि, परम चेतना द्वारा ब्रह्मांड की रचना सभी के लिए प्रकृति के नियमों का पालन कर इसका आनंद उठाने के लिए की गई है, अतः जब ज्ञानेन्द्रियाँ प्राकृतिक नियमों का पालन करने के बजाय स्वेच्छाचारी हो जाती हैं तो मन अहंकारी हो जाता है। मूल रूप से यह युद्ध अहम (ईगो) और परम चेतना के मध्य संघर्ष है। वास्तव में, जैसा श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है, हम सब उसी परम चेतना का अंग हैं।
ये प्राकृतिक नियम जाति, नस्ल, लिंग, मानव गैर मानव के भेद से परे हैं। ये सिद्धान्त धर्म का वर्णन हैं जो ब्रह्मांड को एक साथ जोड़ कर रखते हैं। इन सिद्धांतों का अध्ययन कर उन्हें आत्मसात किये बिना मन, शरीर और आत्मा में समग्र स्वास्थ्य को प्राप्त करना कठिन है। इस अध्ययन के बिना हम अपने प्रदर्शित कर्म को अर्थ प्रदान करने के प्रयास के कुचक्र में फंस जाते हैं। कभी कभी, शरीर का उपचार तो किया जाता है, लेकिन मन का उपचार नहीं किया जाता है। ऐसी स्थिति में असंतुलित मन शरीर को पुनः रोग की स्थिति में ले आता है। प्रकृति के नियमों का अध्ययन किये बिना हम एक से दूसरे मार्ग पर भटकते रहते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता विस्तृत वैदिक तंत्र का संक्षिप्त रूप है। वेद आयुर्वेद का स्रोत भी हैं। वे अपने प्रवर्तक देवताओं की भांति एक ही हैं। दोनों में ही समस्या को परम चेतना से विचलन का परिणाम ही माना गया है। उदाहरणार्थ, जब हम प्रकृति के नियमों के विपरीत कोई कार्य करते हैं तो यह कर्म परिणाम के साथ साथ स्वास्थ्य परिणाम भी देता है। जब कोई व्यक्ति अपनी प्रकृति के विपरीत कोई कार्य करता है तो वह प्रज्ञापराध, परम चेतना के विरुद्ध अपराध कहलाता है। प्रज्ञा को परम ज्ञान या चेतना माना गया है जिसे प्राणी के साथ साथ सम्पूर्ण ब्रह्मांड में संतुलन बनाए रखना होता है।
तो आइए! श्रीमद्भगवद्गीता और आयुर्वेद के उन मूलभूत सिद्धांतों पर दृष्टिपात करते हैं जो आयुर्वेद और प्राकृतिक नियमों का आधार हैं।
यदादित्यगतं तेजो तगद्भासयतेड खिलम।
यचचंद्रमसि यच्चागनौ तत्तेजो विद्धि मामकम।।
श्रीमद्भगवद्गीता (15/12)
अर्थात, सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चंद्रमा में है और जो अग्नि में है, उसको तू मेरा ही जान।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह ऊर्जा जो प्रकाश और उसकी किरणों के रूप में है, वह उनसे, अर्थात परम चेतना से ही उत्पन्न होती है। प्रकाश सूर्य के रूप में प्रकट होता है जो हमारे संसार को प्रकाशित करता है और वह प्रत्येक ऊर्जा के पदार्थ में तथा प्रत्येक पदार्थ के ऊर्जा में बदलने के लिए सभी आवश्यक परिवर्तनों का कारण होता है। यह प्राण शक्ति भी है जो जीवन के ओज का कारण होती है। यह समस्त वनस्पति जगत का कारण है जो प्रकाश ऊर्जा को भोजन में परिवर्तित करता है। वही प्रकाश चंद्रमा द्वारा शीतल एवम शांति ऊर्जा में प्रतिबिम्बित होता जो हमें विश्राम और शांतिपूर्ण नींद में सहायता करता है।
इस प्रकार, वही ऊर्जा गर्म या शीतल हो सकती है, या दिन और रात का कारण हो सकती है और जीवन चक्र को बनाये रखती है। यह प्रकाश ऊर्जा समस्त चराचर जगत के प्रत्येक कण में सुप्तावस्था में विद्यमान रहती है और अग्नि के रूप में व्यक्त होती है। अब हम अग्नि के चक्र को देखते हैं। चेतना का प्रकाश सूर्य के ताप और प्रकाश के रूप में व्यक्त होता है। प्रकाश संश्लेषण के द्वारा यह प्रकाश पौधों में ग्रहण और रूपांतरित किया जाता है। पौधा बीज देता है, बीज तैल देता है, जब यह तैल लैंप में प्रयोग किया जाता है तो हम लपट देखते हैं जो अग्नि के रूप में व्यक्त परम चेतना है।
श्रीमद्भगवद्गीता हमें प्रकृति का नियम या श्रीकृष्ण या परम चेतना के सिद्धांत के साथ एक रूप होने का संदेश देती है और आयुर्वेद हमें अपनी आंतरिक अग्नि और ब्रह्मांड की अग्नि के साथ सम्पूर्ण गठबंधन करने का संदेश देता है। विभिन्न दृष्टिकोणों में, ये सभी एक और समान हैं। अब हम श्रीमद्भगवद्गीता और आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों के मध्य संबंध को देखते हैं।
प्रकाश, परम चेतना की सूक्ष्म ऊर्जा है। आगे, प्रत्येक जीवित प्राणी को भोजन, जल और वायु की आवश्यकता होती है। ये आवश्यकताएं प्राणजीवनीय शक्ति और शरीर को एक साथ, एक सत्ता में बनाये रखने के लिए सहायता करती है, इसलिए चेतना प्राणी द्वारा व्यक्त होती है। वैयक्तिक कार्यक्रम को लौकिक कार्यक्रम के साथ समरसता में कार्य करने की आवश्यकता होती है। अग्नि के चक्र के द्वारा इन दो सत्ताओं के मध्य परस्पर क्रिया और ऊर्जा का विनिमय होता रहता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अग्नि तत्व के महत्व की व्याख्या निम्नवत की है –
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्रणापानसमायुक्तः पचामयन्नम चतुर्विधम।।
श्रीमद्भगवद्गीता (15/14)
अर्थात, मैं ही प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर अग्नि रूप होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूं। प्रत्येक प्राणी के शरीर में, जीवन शक्ति वैश्वानर नामक अग्नि के रूप में प्रकट होती है। यह प्राण और अपान तथा उत्थान और पतन की गतिविधियों के चक्र के लिए उत्तरदायी है।
वस्तुओं को अंदर और बाहर लेना प्राण ऊर्जा का कार्य है। जबकि अपान सभी उत्सर्जन प्रक्रियाओं की ऊपर और नीचे की ओर की गतिविधियों के लिए उत्तरदायी होती हैं। अग्नि की सहायता से भोजन को पचाकर हार्मोन्स और एंजाइम्स के द्वारा सभी सातों अनिवार्य शारीरिक ऊतकों में परिवर्तित किया जाता है। यदि प्राण और अपान का कार्य रुक जाता है तो जीवन भी रुक जाता है, लेकिन यह अग्नि ही है जो उनके संतुलित कार्य करने के लिए उत्तरदायी होती है।
यह श्लोक आगे कहता है कि चार प्रकार के भोजन कैसे होते हैं – भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य। जिन्हें चबाकर खाया जाता है वे भक्ष्य, जैसे – रोटी आदि, जो निगला जाता है, भोज्य, जैसे – दूध आदि, जो चाटा जाता है, लेह्य, जैसे - चटनी आदि, तथा चोष्य, जिन्हें चूसा जाता है, जैसे – ईख आदि। इन सभी भोजनों को वैश्वानर नामक अग्नि द्वारा पचाया जाता है।
वह परम चेतना, भोजन को प्रत्येक प्राणी के लिए आवश्यक ऊर्जा में परिवर्तित करने के लिए उत्तरदायी है। चूंकि, वह परम चेतना समस्त भोजन को पचाने के लिए उत्तरदायी है, अतः हमको अपनी शारीरिक संरचना के अनुसार ही भोजन ग्रहण करना चाहिए जो उसके (परम चेतना) द्वारा सर्वाधिक संतुलित रूप में अधिगृहीत की जाती है। भगवान श्रीकृष्ण आगे कहते हैं –
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्त: स्मृतिर्ज्ञाननपोहनम च।
वेदश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदांत्कृद्वेदविरेव चाहं।।
श्रीमद्भगवद्गीता (15/15)
अर्थात, मैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में अंतर्यामी रूप से स्थित हूं तथा मुझमें ही स्मृति, ज्ञान और अहोपन होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूं तथा वेदांत का कर्ता और वेदों को जानने वाला मैं ही हूं।
इस प्रकार, श्रीकृष्ण, जो लौकिक ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करते हैं, आगे कहते हैं “मैं प्रत्येक कण या प्रत्येक चराचर जगत में नाभिक के रूप में विद्यमान हूं। मैं प्रत्येक मानव के हृदय में और प्रत्येक प्राणी में ओज के रूप में निवास करता हूँ। स्मृति, ज्ञान और निर्णय करने की दुविधा को दूर करने की शक्ति, ये सभी मेरे ही गुण हैं।“ इस सभी को देखना और जानना मूल स्रोत हैं। एक बार जब हम इसे समझ लेते हैं तो हम प्राकृतिक नियमों का अभ्यास में भी पालन करने लगते हैं।
बदले में, इसका अभ्यास करके, हम इसे अधिक भी समझ सकते हैं। इस प्रकार, जब हम ऐसा निर्णय लेते हैं जो प्रकृति के विरुद्ध होता है, तो हम स्वतः परम चेतना के विरुद्ध कार्य करने लगते हैं। इस प्रकार के कार्य, कर्म में या प्राकृतिक नियमों में प्रज्ञापराध के रूप में जाने जाते हैं।
बहुत सी तकनीकियां, जैसे ध्यान या चिंतन, जो चेतना की ओर ले जाती हैं, हमें लौकिक ऊर्जा को समझने में सहायता करती हैं, परम चेतना के कार्यक्रम के साथ लौकिक ऊर्जा है।
समस्त चराचर जगत की तरह, हमारा जीवन भी भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा का कुल योग है। जब हम केवल भौतिक ऊर्जा की टॉनिक, प्रोटीन, खनिजों और औषधियों की सहायता से देखभाल करते हैं लेकिन अन्य दो पक्षों की अनदेखी कर देते हैं तो यह कार्य नहीं करेगी। यह एक समग्र दृष्टिकोण है जिसकी वकालत श्रीमद्भगवद्गीता और आयुर्वेद दोनों ही करते हैं।संतुलन या बैलेंस की आवश्यकता केवल मानवों तक ही सीमित नहीं है बल्कि समस्त प्राणी जगत पर लागू होती है और इस ग्रह के समस्त चराचर जगत और हमारे ब्रह्मांड तक विस्तृत होती है, कोई भी व्यक्ति इस प्राणशक्ति या अग्नि की भूमिका के विरुद्ध नहीं जा सकता। इसे अच्छे स्वास्थ्य, सफल और आनंदपूर्ण जीवन के लिए समझा और अपनाया जाता है।
यह कोई गुप्त विचार नहीं है, इसे केवल अभ्यास के द्वारा समझा जा सकता है। यह हमारी सम्पूर्ण प्राचीन संस्कृति का आधार है जिसका नाम सत्य पर – भारत  रखा गया है। भा का अर्थ प्रकाश और रत का का अर्थ रुचि रखने वाला है। भारत का अंग होने का अर्थ प्रकाश के रूप में अग्नि की भूमिका में रुचि रखना और इसके स्रोत, परम चेतना के बारे में जानना है।

समग्र स्वास्थ्य चाहिए तो अपनाएं आयुर्वेद!

सम्पूर्ण स्वास्थ्य चाहिये तो अपनाएं आयुर्वेद
आधुनिकता की अंधी दौड़ के कारण हमारी युवा पीढ़ी ने जिस बेतुकी जीवन शैली को अपना रखा है उसने इन दिनों जिन स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दिया है उनसे शायद ही कोई बच पाया है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति, एलोपैथ की अपनी सीमाएं हैं, वह समस्या को जड़ से समाप्त करने के बजाय केवल कुछ समय के लिए दबाने में ही सफल हो पाती है। बाद में वही समस्या और भी विकराल रूप धारण कर लेती है। यही कारण है कि दुनियां अब भारत के प्राचीन चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रही है।
भारत के प्राचीन इतिहास पर दृष्टि डालने पर पता चलता है कि प्राचीन काल में आयुर्वेद अत्यंत विकसित अवस्था में था। अथर्व वेद में आयुर्वेद का विस्तृत वर्णन मिलता है। नालंदा विश्वविद्यालय के पांच अनिवार्य विषयों में आयुर्वेद भी शामिल था। विभिन्न एशियाई देशों – चीन, मध्य एशिया, मंगोलिया आदि के विद्यार्थी जब नालंदा विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूर्ण कर जब अपने देश वापस लौटते तो अपने साथ भारतीय चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद का ज्ञान भी अपने साथ ले जाते थे। यूरोपीय देशों में भी आयुर्वेद की प्रतिष्ठा भारत से कम नहीं थी।
लेकिन, इतना अवश्य है कि भारत और यूरोपीय चिकित्सा लेखकों की लेखन शैली में एक स्पष्ट अंतर रहा। जहां भारतीय लेखकों ने आयुर्वेद का इतिहास लिखने समय इसकी परंपरा, आचार्य, प्रवर्तक और ग्रंथों की विशेष रूप की है, वहीं यूरोपीय विद्वानों ने आयुर्वेद के आचार्यों व ग्रन्थों की संक्षिप्त चर्चा कर आयुर्वेद का प्रतिपादन करने का प्रयास किया है। यूरोपीय लेखकों में डॉ. सिम्मर की हिन्दू मेडिसिन तथा डॉ. जॉली की इंडियन मेडिसिन आयुर्वेद चिकित्सा पर योरोपीय लेखन की उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
जब हम आयुर्वेद के प्राचीन इतिहास का अवलोकन करते हैं तो पता चलता है कि भारत के पड़ोसी देशों में भी आपस में चिकित्सकीय ज्ञान का आदान प्रदान होता था। आयुर्वेद के ग्रंथों की तिब्बती भाषा में रचना फिर बाद में मंगोलियन भाषा में उसका अनुवाद इस चिकित्सकीय ज्ञान के आदान प्रदान का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। तिब्बती चिकित्सा का मूल आधार आज भी आयुर्वेद ही है। श्रीलंका में तो आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा का दर्जा प्राप्त है। वहां आयुर्वेद के विकास और इसमें नवीनतम अनुसंधान को प्राथमिकता दी जाती है। श्रीलंका में आयुर्वेद का प्रवेश  बौद्ध धर्म के साथ ही हुआ था।  तबसे वहां पर आयुर्वेद परंपरागत रूप से आज भी विद्यमान है।
वर्तमान परिस्थितियों में आयुर्वेद की प्रासंगिकता निश्चित रूप से बढ़ी है। भारत और एशियाई देशों के साथ साथ पाश्चात्य जगत – अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी आदि देशों में भी आयुर्वेद को अपनाया जाने लगा है। अब एलोपैथिक चिकित्सक भी मानने लगे हैं कि आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ के रूप में प्रकृति का वर्णन पूर्णतः वैज्ञानिक है। वात प्रकृति का संबंध संचरण से होता है। यह संचरण रक्त, श्वसन, विचार आदि किसी का भी हो सकता है। पित्त का संबंध मेटाबोलिज़्म, अर्थात, हार्मोन्स, रक्त, जैव रसायनों और एंजाइम्स से है। इसी प्रकार, कफ प्रकृति का सम्बन्ध संरचनात्मक, अर्थात, हड्डियों, ऊतकों की बनावट से है।
आयुर्वेद में वर्णित त्रिदोषों का निर्माण पंचमहाभूतों से हुआ है। वात प्रकृति का निर्माण आकाश तथा वायु तत्व से होता है अतः इस प्रकृति के लोग प्रायः दुर्बलता और गैस की बीमारी से पीडित होते हैं। उनको प्रायः नींद कम आने या बिल्कुल न आने की शिकायत होती है। उनके दिल की धड़कन प्रायः अनियमित, शरीर का तापमान कम एवं त्वचा शुष्क रहती है।
पित्त प्रकृति का निर्माण अग्नि व जल तत्व से होता है। इस प्रकृति के व्यक्ति प्रायः गर्मी से त्रस्त रहते हैं उन्हें पसीना अधिक आता है और वे एसिडिटी के शिकार होते हैं। कफ प्रकृति का निर्माण पृथ्वी और जल तत्व से होता है। कफ का प्रकोप होने पर शरीर में भारीपन, सर्दी-जुकाम, कफ, खांसी, शरीर में अकड़न एवं स्वाद के प्रति अरुचि उत्पन्न होती है। आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार ये त्रिदोष शरीर का स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूप से संचालन करते हैं। जब ये त्रिदोष संतुलित रहते हैं तो शारीरिक और मानसिक क्रियाएं स्वाभाविक रूप से कार्य करती हैं और व्यक्ति स्वस्थ रहता है, इनके असंतुलित होने पर रोग उत्पन्न होते हैं।
मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े त्रिदोषों के अनुसार शरीर की प्रकृति को पहचान कर मौसम के अनुरूप उपयुक्त खान-पान एवं जीवनचर्या का पालन करके रोगों के आक्रमण से बचाव संभव है।
खाद्य वस्तुओं के स्वाद का भी इन त्रिदोषों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जैसे, मीठी वस्तुएं वात और पित्त को कम करती हैं, कफ को बढ़ाती हैं, नमकीन और खट्टी चीजें वात को कम करती हैं पित्त को बढ़ाती हैं, कसैली चीजें वात को बढ़ाती हैं पित्त और कफ को कम करती हैं और तीखी वस्तुएं वात और पित्त को बढ़ाती हैं और कफ को कम करती हैं।
इसी प्रकार, पाचन क्रिया सुबह सूर्योदय के 2-3 घंटे बाद से लेकर मध्याह्न तक तीव्र होती है इसलिए इस अवधि में गरिष्ठ एवं प्रोटीन युक्त चीजें खाई जा सकती हैं। मध्याह्न के बाद पाचन क्रिया शिथिल पड़ने लगती है इसलिए आयुर्वेद में शाम को हल्के भोजन की आवश्यकता बताई गई है। रात को प्रोटीन का अधिक सेवन कर के पर अपच और नींद संबंधी विकार उत्पन्न होने की संभावना बढ़ जाती है
जहां अन्य चिकित्सा पद्धतियां मनुष्य के केवल शरीर को आधार मानकर विकृतियों को दूर करने का उपाय खोजती हैं, वहीं आयुर्वेद के अनुसार जब मन पर ईर्ष्या, द्वेष, भय, संदेह जैसे मनोविकार जन्म लेते हैं तो मन अशांत और विचलित होने लगता है जिसका परिणाम मधुमेह, हृदय रोग या मस्तिष्क की नसें फट जाने आदि रूपों में दिखाई देता है। आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद अहम केंद्रित इच्छाओं का त्याग करने का आदेश देता है। ऐसी स्थिति में आ जाने पर मन मे कोई विकार उत्पन्न नहीं होता। मन निर्विकार होने पर शरीर के व्याधि ग्रस्त होने का प्रश्न ही नहीं उठता। इतना ही नहीं, आयुर्वेद के अनुसार ज्वर की उत्पत्ति भी शरीर पर लक्षण के रूप में व्यक्त होने के पूर्व, मन में ही होती है। इसलिए, शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को प्रदान करने वाला आयुर्वेद भारत की आध्यात्मिक संस्कृति की विशेष प्राण से युक्त होकर, समग्र स्वास्थ्य प्रदान करता है।