सम्पूर्ण स्वास्थ्य चाहिये तो अपनाएं आयुर्वेद
आधुनिकता की अंधी दौड़ के कारण हमारी युवा पीढ़ी ने जिस बेतुकी जीवन शैली को अपना रखा है उसने इन दिनों जिन स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दिया है उनसे शायद ही कोई बच पाया है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति, एलोपैथ की अपनी सीमाएं हैं, वह समस्या को जड़ से समाप्त करने के बजाय केवल कुछ समय के लिए दबाने में ही सफल हो पाती है। बाद में वही समस्या और भी विकराल रूप धारण कर लेती है। यही कारण है कि दुनियां अब भारत के प्राचीन चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रही है।
भारत के प्राचीन इतिहास पर दृष्टि डालने पर पता चलता है कि प्राचीन काल में आयुर्वेद अत्यंत विकसित अवस्था में था। अथर्व वेद में आयुर्वेद का विस्तृत वर्णन मिलता है। नालंदा विश्वविद्यालय के पांच अनिवार्य विषयों में आयुर्वेद भी शामिल था। विभिन्न एशियाई देशों – चीन, मध्य एशिया, मंगोलिया आदि के विद्यार्थी जब नालंदा विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूर्ण कर जब अपने देश वापस लौटते तो अपने साथ भारतीय चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद का ज्ञान भी अपने साथ ले जाते थे। यूरोपीय देशों में भी आयुर्वेद की प्रतिष्ठा भारत से कम नहीं थी।
लेकिन, इतना अवश्य है कि भारत और यूरोपीय चिकित्सा लेखकों की लेखन शैली में एक स्पष्ट अंतर रहा। जहां भारतीय लेखकों ने आयुर्वेद का इतिहास लिखने समय इसकी परंपरा, आचार्य, प्रवर्तक और ग्रंथों की विशेष रूप की है, वहीं यूरोपीय विद्वानों ने आयुर्वेद के आचार्यों व ग्रन्थों की संक्षिप्त चर्चा कर आयुर्वेद का प्रतिपादन करने का प्रयास किया है। यूरोपीय लेखकों में डॉ. सिम्मर की हिन्दू मेडिसिन तथा डॉ. जॉली की इंडियन मेडिसिन आयुर्वेद चिकित्सा पर योरोपीय लेखन की उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
जब हम आयुर्वेद के प्राचीन इतिहास का अवलोकन करते हैं तो पता चलता है कि भारत के पड़ोसी देशों में भी आपस में चिकित्सकीय ज्ञान का आदान प्रदान होता था। आयुर्वेद के ग्रंथों की तिब्बती भाषा में रचना फिर बाद में मंगोलियन भाषा में उसका अनुवाद इस चिकित्सकीय ज्ञान के आदान प्रदान का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। तिब्बती चिकित्सा का मूल आधार आज भी आयुर्वेद ही है। श्रीलंका में तो आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा का दर्जा प्राप्त है। वहां आयुर्वेद के विकास और इसमें नवीनतम अनुसंधान को प्राथमिकता दी जाती है। श्रीलंका में आयुर्वेद का प्रवेश बौद्ध धर्म के साथ ही हुआ था। तबसे वहां पर आयुर्वेद परंपरागत रूप से आज भी विद्यमान है।
वर्तमान परिस्थितियों में आयुर्वेद की प्रासंगिकता निश्चित रूप से बढ़ी है। भारत और एशियाई देशों के साथ साथ पाश्चात्य जगत – अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी आदि देशों में भी आयुर्वेद को अपनाया जाने लगा है। अब एलोपैथिक चिकित्सक भी मानने लगे हैं कि आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ के रूप में प्रकृति का वर्णन पूर्णतः वैज्ञानिक है। वात प्रकृति का संबंध संचरण से होता है। यह संचरण रक्त, श्वसन, विचार आदि किसी का भी हो सकता है। पित्त का संबंध मेटाबोलिज़्म, अर्थात, हार्मोन्स, रक्त, जैव रसायनों और एंजाइम्स से है। इसी प्रकार, कफ प्रकृति का सम्बन्ध संरचनात्मक, अर्थात, हड्डियों, ऊतकों की बनावट से है।
आयुर्वेद में वर्णित त्रिदोषों का निर्माण पंचमहाभूतों से हुआ है। वात प्रकृति का निर्माण आकाश तथा वायु तत्व से होता है अतः इस प्रकृति के लोग प्रायः दुर्बलता और गैस की बीमारी से पीडित होते हैं। उनको प्रायः नींद कम आने या बिल्कुल न आने की शिकायत होती है। उनके दिल की धड़कन प्रायः अनियमित, शरीर का तापमान कम एवं त्वचा शुष्क रहती है।
पित्त प्रकृति का निर्माण अग्नि व जल तत्व से होता है। इस प्रकृति के व्यक्ति प्रायः गर्मी से त्रस्त रहते हैं उन्हें पसीना अधिक आता है और वे एसिडिटी के शिकार होते हैं। कफ प्रकृति का निर्माण पृथ्वी और जल तत्व से होता है। कफ का प्रकोप होने पर शरीर में भारीपन, सर्दी-जुकाम, कफ, खांसी, शरीर में अकड़न एवं स्वाद के प्रति अरुचि उत्पन्न होती है। आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार ये त्रिदोष शरीर का स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूप से संचालन करते हैं। जब ये त्रिदोष संतुलित रहते हैं तो शारीरिक और मानसिक क्रियाएं स्वाभाविक रूप से कार्य करती हैं और व्यक्ति स्वस्थ रहता है, इनके असंतुलित होने पर रोग उत्पन्न होते हैं।
मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े त्रिदोषों के अनुसार शरीर की प्रकृति को पहचान कर मौसम के अनुरूप उपयुक्त खान-पान एवं जीवनचर्या का पालन करके रोगों के आक्रमण से बचाव संभव है।
खाद्य वस्तुओं के स्वाद का भी इन त्रिदोषों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जैसे, मीठी वस्तुएं वात और पित्त को कम करती हैं, कफ को बढ़ाती हैं, नमकीन और खट्टी चीजें वात को कम करती हैं पित्त को बढ़ाती हैं, कसैली चीजें वात को बढ़ाती हैं पित्त और कफ को कम करती हैं और तीखी वस्तुएं वात और पित्त को बढ़ाती हैं और कफ को कम करती हैं।
इसी प्रकार, पाचन क्रिया सुबह सूर्योदय के 2-3 घंटे बाद से लेकर मध्याह्न तक तीव्र होती है इसलिए इस अवधि में गरिष्ठ एवं प्रोटीन युक्त चीजें खाई जा सकती हैं। मध्याह्न के बाद पाचन क्रिया शिथिल पड़ने लगती है इसलिए आयुर्वेद में शाम को हल्के भोजन की आवश्यकता बताई गई है। रात को प्रोटीन का अधिक सेवन कर के पर अपच और नींद संबंधी विकार उत्पन्न होने की संभावना बढ़ जाती है
जहां अन्य चिकित्सा पद्धतियां मनुष्य के केवल शरीर को आधार मानकर विकृतियों को दूर करने का उपाय खोजती हैं, वहीं आयुर्वेद के अनुसार जब मन पर ईर्ष्या, द्वेष, भय, संदेह जैसे मनोविकार जन्म लेते हैं तो मन अशांत और विचलित होने लगता है जिसका परिणाम मधुमेह, हृदय रोग या मस्तिष्क की नसें फट जाने आदि रूपों में दिखाई देता है। आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद अहम केंद्रित इच्छाओं का त्याग करने का आदेश देता है। ऐसी स्थिति में आ जाने पर मन मे कोई विकार उत्पन्न नहीं होता। मन निर्विकार होने पर शरीर के व्याधि ग्रस्त होने का प्रश्न ही नहीं उठता। इतना ही नहीं, आयुर्वेद के अनुसार ज्वर की उत्पत्ति भी शरीर पर लक्षण के रूप में व्यक्त होने के पूर्व, मन में ही होती है। इसलिए, शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को प्रदान करने वाला आयुर्वेद भारत की आध्यात्मिक संस्कृति की विशेष प्राण से युक्त होकर, समग्र स्वास्थ्य प्रदान करता है।
आधुनिकता की अंधी दौड़ के कारण हमारी युवा पीढ़ी ने जिस बेतुकी जीवन शैली को अपना रखा है उसने इन दिनों जिन स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दिया है उनसे शायद ही कोई बच पाया है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति, एलोपैथ की अपनी सीमाएं हैं, वह समस्या को जड़ से समाप्त करने के बजाय केवल कुछ समय के लिए दबाने में ही सफल हो पाती है। बाद में वही समस्या और भी विकराल रूप धारण कर लेती है। यही कारण है कि दुनियां अब भारत के प्राचीन चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रही है।
भारत के प्राचीन इतिहास पर दृष्टि डालने पर पता चलता है कि प्राचीन काल में आयुर्वेद अत्यंत विकसित अवस्था में था। अथर्व वेद में आयुर्वेद का विस्तृत वर्णन मिलता है। नालंदा विश्वविद्यालय के पांच अनिवार्य विषयों में आयुर्वेद भी शामिल था। विभिन्न एशियाई देशों – चीन, मध्य एशिया, मंगोलिया आदि के विद्यार्थी जब नालंदा विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूर्ण कर जब अपने देश वापस लौटते तो अपने साथ भारतीय चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद का ज्ञान भी अपने साथ ले जाते थे। यूरोपीय देशों में भी आयुर्वेद की प्रतिष्ठा भारत से कम नहीं थी।
लेकिन, इतना अवश्य है कि भारत और यूरोपीय चिकित्सा लेखकों की लेखन शैली में एक स्पष्ट अंतर रहा। जहां भारतीय लेखकों ने आयुर्वेद का इतिहास लिखने समय इसकी परंपरा, आचार्य, प्रवर्तक और ग्रंथों की विशेष रूप की है, वहीं यूरोपीय विद्वानों ने आयुर्वेद के आचार्यों व ग्रन्थों की संक्षिप्त चर्चा कर आयुर्वेद का प्रतिपादन करने का प्रयास किया है। यूरोपीय लेखकों में डॉ. सिम्मर की हिन्दू मेडिसिन तथा डॉ. जॉली की इंडियन मेडिसिन आयुर्वेद चिकित्सा पर योरोपीय लेखन की उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
जब हम आयुर्वेद के प्राचीन इतिहास का अवलोकन करते हैं तो पता चलता है कि भारत के पड़ोसी देशों में भी आपस में चिकित्सकीय ज्ञान का आदान प्रदान होता था। आयुर्वेद के ग्रंथों की तिब्बती भाषा में रचना फिर बाद में मंगोलियन भाषा में उसका अनुवाद इस चिकित्सकीय ज्ञान के आदान प्रदान का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। तिब्बती चिकित्सा का मूल आधार आज भी आयुर्वेद ही है। श्रीलंका में तो आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा का दर्जा प्राप्त है। वहां आयुर्वेद के विकास और इसमें नवीनतम अनुसंधान को प्राथमिकता दी जाती है। श्रीलंका में आयुर्वेद का प्रवेश बौद्ध धर्म के साथ ही हुआ था। तबसे वहां पर आयुर्वेद परंपरागत रूप से आज भी विद्यमान है।
वर्तमान परिस्थितियों में आयुर्वेद की प्रासंगिकता निश्चित रूप से बढ़ी है। भारत और एशियाई देशों के साथ साथ पाश्चात्य जगत – अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी आदि देशों में भी आयुर्वेद को अपनाया जाने लगा है। अब एलोपैथिक चिकित्सक भी मानने लगे हैं कि आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ के रूप में प्रकृति का वर्णन पूर्णतः वैज्ञानिक है। वात प्रकृति का संबंध संचरण से होता है। यह संचरण रक्त, श्वसन, विचार आदि किसी का भी हो सकता है। पित्त का संबंध मेटाबोलिज़्म, अर्थात, हार्मोन्स, रक्त, जैव रसायनों और एंजाइम्स से है। इसी प्रकार, कफ प्रकृति का सम्बन्ध संरचनात्मक, अर्थात, हड्डियों, ऊतकों की बनावट से है।
आयुर्वेद में वर्णित त्रिदोषों का निर्माण पंचमहाभूतों से हुआ है। वात प्रकृति का निर्माण आकाश तथा वायु तत्व से होता है अतः इस प्रकृति के लोग प्रायः दुर्बलता और गैस की बीमारी से पीडित होते हैं। उनको प्रायः नींद कम आने या बिल्कुल न आने की शिकायत होती है। उनके दिल की धड़कन प्रायः अनियमित, शरीर का तापमान कम एवं त्वचा शुष्क रहती है।
पित्त प्रकृति का निर्माण अग्नि व जल तत्व से होता है। इस प्रकृति के व्यक्ति प्रायः गर्मी से त्रस्त रहते हैं उन्हें पसीना अधिक आता है और वे एसिडिटी के शिकार होते हैं। कफ प्रकृति का निर्माण पृथ्वी और जल तत्व से होता है। कफ का प्रकोप होने पर शरीर में भारीपन, सर्दी-जुकाम, कफ, खांसी, शरीर में अकड़न एवं स्वाद के प्रति अरुचि उत्पन्न होती है। आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार ये त्रिदोष शरीर का स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूप से संचालन करते हैं। जब ये त्रिदोष संतुलित रहते हैं तो शारीरिक और मानसिक क्रियाएं स्वाभाविक रूप से कार्य करती हैं और व्यक्ति स्वस्थ रहता है, इनके असंतुलित होने पर रोग उत्पन्न होते हैं।
मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े त्रिदोषों के अनुसार शरीर की प्रकृति को पहचान कर मौसम के अनुरूप उपयुक्त खान-पान एवं जीवनचर्या का पालन करके रोगों के आक्रमण से बचाव संभव है।
खाद्य वस्तुओं के स्वाद का भी इन त्रिदोषों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जैसे, मीठी वस्तुएं वात और पित्त को कम करती हैं, कफ को बढ़ाती हैं, नमकीन और खट्टी चीजें वात को कम करती हैं पित्त को बढ़ाती हैं, कसैली चीजें वात को बढ़ाती हैं पित्त और कफ को कम करती हैं और तीखी वस्तुएं वात और पित्त को बढ़ाती हैं और कफ को कम करती हैं।
इसी प्रकार, पाचन क्रिया सुबह सूर्योदय के 2-3 घंटे बाद से लेकर मध्याह्न तक तीव्र होती है इसलिए इस अवधि में गरिष्ठ एवं प्रोटीन युक्त चीजें खाई जा सकती हैं। मध्याह्न के बाद पाचन क्रिया शिथिल पड़ने लगती है इसलिए आयुर्वेद में शाम को हल्के भोजन की आवश्यकता बताई गई है। रात को प्रोटीन का अधिक सेवन कर के पर अपच और नींद संबंधी विकार उत्पन्न होने की संभावना बढ़ जाती है
जहां अन्य चिकित्सा पद्धतियां मनुष्य के केवल शरीर को आधार मानकर विकृतियों को दूर करने का उपाय खोजती हैं, वहीं आयुर्वेद के अनुसार जब मन पर ईर्ष्या, द्वेष, भय, संदेह जैसे मनोविकार जन्म लेते हैं तो मन अशांत और विचलित होने लगता है जिसका परिणाम मधुमेह, हृदय रोग या मस्तिष्क की नसें फट जाने आदि रूपों में दिखाई देता है। आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद अहम केंद्रित इच्छाओं का त्याग करने का आदेश देता है। ऐसी स्थिति में आ जाने पर मन मे कोई विकार उत्पन्न नहीं होता। मन निर्विकार होने पर शरीर के व्याधि ग्रस्त होने का प्रश्न ही नहीं उठता। इतना ही नहीं, आयुर्वेद के अनुसार ज्वर की उत्पत्ति भी शरीर पर लक्षण के रूप में व्यक्त होने के पूर्व, मन में ही होती है। इसलिए, शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को प्रदान करने वाला आयुर्वेद भारत की आध्यात्मिक संस्कृति की विशेष प्राण से युक्त होकर, समग्र स्वास्थ्य प्रदान करता है।
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