आज जब पूरी दुनिया कोरोना वाइरस से इस तरह त्रस्त है कि अविकसित, अल्पविकसित, विकासशील देशों की बात बहुत दूर, तथाकथित विकसित देश भी इस महामारी के सामने नतमस्तक दिखाई दे रहे हैं। साथ ही, इस वैश्विक स्वास्थ्य संकट ने पूरी दुनिया को एक और अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि मानव प्रकृति पर विजय पाने के आंपने जुनून के कारण, स्रष्टि के प्राकृतिक स्वरूप के साथ जितना अधिक छेडछाड़ करना करता है, प्रकृति उतनी ही अधिक प्रबलता के साथ अपने वास्तविक स्वरूप को फिर से पाने के लिए मानव प्रयासों पर कठोर प्रहार करती है। इस वैश्विक महामारी से बचाव के लिए दुनिया को जब कोई रास्ता समझ में नहीं आ रहा था, तब भारत ने ही आगे बढ़ कर लॉकडाउन के रूप में, संचारी रोगों से बचाव के लिए सदियों से कारगर उपाय संगरोध (quarantine) का प्रयोग कर इसकी रोकथाम के लिए सार्थक प्रयास किए। इस प्रयास के जब सकारात्मक परिणाम के रूप में, वाइरस के प्रसार में उल्लेखनीय कमी आती दिखने लगी तो अन्य देशों ने भी इसे अपनाया और उल्लेखनीय सफलता हासिल की। इस लॉकडाउन के दौरान, सभी प्रकार की मानव गतिविधियां बंद होने के कारण प्रदूषण में भी भारी कमी आई।
इस महामारी ने दुनिया को प्रकृति की महाशक्ति का संदेश तो दिया ही है साथ ही इस तथ्य से भी अवगत कराया है कि स्वस्थ एवं दीर्घायु होने के लिए हमें प्रकृति के साथ चलने की जरूरत है। प्रकृति ने हमें सब कुछ दिया है। यदि हम प्रकृति के अनुकूल रह कर और उपयुक्त सामंजस्य बना कर रहते हैं तो प्रकृति हमारे लिए हर तरह से सहयोगी की भूमिका निभाती है। इसके विपरीत, मानव जब जब प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा के वशीभूत होकर प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करता है तो उपयुक्त समय पर प्रकृति भी अपना रौद्र रूप दिखलाती है तथा कभी महामारी, तो कभी भू-स्खलन, तो कभी भूकंप, कभी समुद्री तूफान तो कभी युद्ध के रूप आकर संतुलन स्थापित कर लेती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार पूरी दुनिया में अब तक करोड़ों लोग इस वाइरस की चपेट में आ चुके हैं और दुनिया भर के सभी चिकित्सा विज्ञान मिल कर भी इस वाइरस के संक्रमण का कोई इलाज खोजना तो बहुत दूर, इससे बचाव का कोई रास्ता भी नहीं खोज सके हैं। इस दिशा में किए जा रहे शोध भी अभी तक ऐसा कोई भी संकेत दे पाने में असफल रहे हैं जिससे आमजन को इसके इलाज के बारे में आशा की कोई किरण भी दिखाई दे सके। यहाँ तक कि अब यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि लोगों को इस वाइरस के साथ जीना सीखना होगा।
यही कारण है कि जब इस वाइरस के बढ़ते प्रकोप ने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, एलोपैथी की सीमाएं पूरी दुनियाँ के सामने एक बार फिर से उजागर कर दीं और एलोपैथी चिकित्सा में प्रयुक्त औषधियाँ और एंटीबायोटिक्स इस वाइरस के सामने बौने सिद्ध हो गए तो दुनिया का ध्यान भारत के प्राचीन स्वास्थ्य विज्ञान, आयुर्वेद पर गया और इसमें वर्णित प्राचीन सिद्धांतों पर शोध किए गए तो सारी दुनिया की समझ में आ गया कि यदि किसी व्यक्ति के शरीर कि इम्यूनिटी (शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता) वाइरस की इम्यूनिटी भेदन क्षमता से अधिक शक्तिशाली होती है तो उस व्यक्ति को यह वाइरस प्रभावित नहीं करता है। इसीलिए, इस वाइरस से बचाव या उपचार के लिए जितने ही अनुसंधान या शोध किए जा रहे हैं सभी का लक्ष्य इम्यूनिटी बढ़ाना ही है।
इन्ही अध्ययनों के आधार पर, जब हमारे देश में इम्यूनिटी बढ़ाने वाली जड़ी बूटियों का प्रयोग संक्रमित और गैर संक्रमित लोगों पर किया गया तो सुखद परिणाम आयें। संक्रमित लोग तेजी के साथ संक्रमण से मुक्त होने लगे, साथ ही, संक्रमण का शिकार होने वाले लोगों में भी उल्लेखनीय कमी आई।
हमारे देश में जितनी तेजी के साथ इम्यूनिटी बढ़ाने वाली जड़ी बूटियों और मसालों - तुलसी, अश्वगंधा, गिलोय, सोंठ, कालीमिर्च, दालचीनी, लौंग आदि का प्रयोग जितनी तेजी के साथ बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी के साथ इस वाइरस से मुक्त होने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में, जब यह लगभग प्रमाणित हो चुका है कि भारत का ही नहीं बल्कि, पूरी दुनिया का प्राचीनतम चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद ही एक ऐसा चिकित्सा विज्ञान है जो न केवल रोगग्रस्त होने पर रोग से मुक्त होने का सुनिश्चित रास्ता बताता है , बल्कि शरीर के रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए वे रास्ते भी बताता है, जिन पर चल कर कोई भी व्यक्ति स्वस्थ रह कर लंबा जीवन जी सकता है, तो समय की मांग है कि इस चिकित्सा विज्ञान के सिद्धांतों पर अधिक से अधिक शोध किये जाएँ और लोगों को उनसे अवगत भी किया जाए।
इसी बात को ध्यान में रखकर, आयुर्वेद के सिद्धांतों को ऐसी सरल भाषा में व्यक्त करने का प्रयास किया गया है जो आमजन को आयुर्वेदमय, स्वास्थ्यप्रद जीवन शैली अपना कर साधारण रोगों के लिए महंगे अँग्रेजी अस्पतालों के चक्कर लगाने से बचाने की दिशा में एक अकिंचन किन्तु, एक सार्थक प्रयास सिद्ध होगा।
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